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Thursday, July 9, 2020

मृत्यु भोज आडंबर... बंद हो, लॉकडाउन ने दी प्रेरणा, इसे ही परंपरा बनाएं

मृत्यु भोज के खिलाफ भास्कर के अभियान से बड़ी संख्या में लोग और समाज जुड़ रहे हैं। कई समाज मृत्युभोज जैसी कुरीति पर प्रतिबंध लगा चुका है लेकिन भास्कर के इस अभियान से इस कुरीति के खिलाफ लड़ाई में और बल मिलेगा। राजपुरोहित तथा अन्य धर्मगुरूओं ने कहा कि मृत्युभोज अब आडंबर हो गया है जो बंद होना चाहिए।

अब देखा-देखी कराया जाता है भोज: प्रद्युम्न लाल
कांकेर के राजपुरोहित प्रद्युम्न लाल शर्मा ने कहा कि मृत्यु भोज को पहले शांति भोज कहा जाता था। भोजन सादा होता था जिसमें परिवार तथा समाज के ही कुछ लोग शिरकत करते थे। अब इसमें आडंबर ज्यादा हो गया है। पकवान बनाए जाते हैं। यह सब गलत है। कहीं-कहीं पूरा गांव शामिल होता है। गरीब परिवारों की शामत आ जाती है। कई गरीब परिवार समर्थ नहीं होते हुए भी देखादखी कर्ज लेकर मृत्युभोज कराते हैं।

मृत्यु कर्म सादगी से होना चाहिए: पं. प्रवीण दुबे
भंडारीपारा निवासी भागवत कथावाचक प्रवीण दुबे ने कहा कि शास्त्रों तथा गरूड़ पुराण में केवल ब्राहण भोज का उल्लेख है। किसी भी समाज को मृत्युभोज कराने परिवार पर दबाव नहीं बनाना चाहिए। उधार या कर्ज लेकर मृत्युभोज नहीं कराना चाहिए। मृत्यु पर होने वाले काम सादगी से होना चाहिए। ब्राहण भोज भी सात्विक होना चाहिए। लॉकडाउन में सादगी से कार्यक्रम किए उसे ही परंपरा बनाना चाहिए।

लॉकडाउन ने दिखाई राह उसी पर चलें: जितेंद्र शर्मा
ग्राम गोविंदपुर निवासी कथावाचक पंडित जितेंद्र शर्मा ने कहा शास्त्रों में मृत्यु के बाद पूजन कर ब्राहण भोज का ही उल्लेख है। आडंबर बिल्कुल नहीं होना चाहिए। लॉकडाउन में सीमित संख्या में परिजनों के माध्यम से जो कार्यक्रम हुआ वह काफी अच्छा है। यह परंपरा आगे भी चलती रहनी चाहिए। मृत्युभोज में ज्यादा खर्च करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।

ब्राह्मण समाज भी सादगी का पक्षधर: मनहरण
ब्राहण समाज जिलाध्यक्ष मनहरण शर्मा ने कहा कि मृत्युभोज समाज में अनिवार्य नहीं है। सामाजिक स्तर पर किसी पर दबाव नहीं डाला जाता। मेरे विचार से सभी समाज में मृत्युभोज बंद होना चाहिए। मृत्यु के बाद कार्यक्रम सादगी से होना चाहिए।
पांच साल पहले से सिंध समाज में मृत्यु भोज बंद
कांकेर सिंध समाज सचिव बलराम अहूजा ने कहा कि उनके समाज में 5 वर्ष से मृत्यु भोज जैसी कुप्रथा बंद है। दूसरे समाजों को भी इस कुप्रथा के खिलाफ आगे आना चाहिए।

भास्कर के अभियान को इनका भी मिला समर्थन
समाजसेवी डा जेएम जैन ने कहा कि मृत्युभोज जैसी कुप्रथा बंद होना चाहिए। मैं अब तक बहुत से मुत्यु भोज में शामिल हुआ हूंं लेकिन प्रतिज्ञा करता हूं आगे से किसी भी मृत्युभोज में शामिल नहीं होउंगा। भास्कर की यह पहल सराहनीय है। मृत्युभोज जैसी कुप्रथा का भरसक विरोध करें। अखिल भारतीय आदिवासी हल्बा समाज कर्मचारी प्रकोष्ठ जिला सचिव उपेश्वर ठाकुर ने कहा कि हल्बा आदिवासी समाज मेें मृत्युभोज की परंपरा नहीं है। मृत्यु संस्कार में शोक संवेदना प्रस्तुत करने दूरदराज से आने वाले परिजनों को सादगी पूर्ण भोजन कराया जाता था लेकिन आज के परिवेश में देखादेखी व्यंजन परोसने लगे हैं। इसे देखते मृत्युभोज पर प्रतिबंध लगाया गया है। शहर के भंडारीपारा पार्षद सुशीला यादव ने कहा कि मृत्युभोज सभी समाजों में बंद होना चाहिए। मृत्युकर्म सादगी से निपटाना चाहिए। ग्राम भोडिय़ा कोरर निवासी युवा शैलेष तिवारी ने कहा मृत्युभोज एक कुप्रथा है। इसे बंद करने से उन गरीब परिवारों को राहत मिलेगी जो एसे भोज कराने अपनी जीवन भर की कमाई खर्च कर देते हैं। परिक्षेत्र साहू समाज पटौद कोषाध्यक्ष ईश्वर लाल साहू ने कहा कि हमारे ग्राम बेवरती में पिछले तीन सालों से मृत्युभोज पर पूरी तरह से प्रतिबंध है।



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