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Thursday, July 23, 2020

फिर सेहत बिगड़ी, खुशहाल परिवार भी बिखरा, तंग आकर मौत को गले लगाने चला तो बेटी के लिए जीने की ठानी

(पुनीत गर्ग)शराब के नशे में पहली बार चिट्टे की डोज लेना युवा इंजीनियर को इतनी महंगी पड़ी कि पौने दो वर्ष में वह 30 लाख का पी गया। चिट्टे की लत में न सिर्फ सीनियर इंजीनियर की नौकरी गंवाई बल्कि पति की लत से दुखी पत्नी भी मायके चली गई। हालात ऐसे बने की आत्महत्या के लिए निकले इंजीनियर को 4 वर्ष की बेटी का प्यार घर लौटा लाया। जिसके बाद नशे को छोड़ने का ऐसा इरादा बनाया कि पौने दो माह के कड़े संघर्ष के बाद वीरवार को नशामुक्त होकर घर लौटा है।
30 वर्षीय रमनदीप वर्मा ने बताया है कि वह निजी कंपनी में सीनियर प्रोडक्शन मैनेजर के पद पर कार्यरत था। पिता भी निजी कंपनी में अच्छे पद पर हैं। पत्नी कौंसलर की जॉब करती है और उनके पास 4 वर्ष की बेटी है। परिवार बेहद खुशहाल था। पौने दो वर्ष पहले वह दोस्तों के साथ शराब पी रहा था कि दोस्त के एक वर्कर ने उनके टेबल पर चिट्टे की पुड़िया रख दी।

उन्होंने शराब के नशे में चिट्टे की डोज भी ले ली। उसके बाद उन्हें चिट्टे की लत लग गई। पहले दोस्तों के साथ एक सप्ताह में 2-3 बार मिलकर चिट्टा लेते थे फिर धीरे- धीरे इसकी रोजाना की आदत बन गई। 500 रुपए रोजाना की डोज की आदत 5 हजार रुपए रोजाना तक की चली गई।

घर में झगड़ा रहने से पत्नी भी साथ छोड़ मायके चली गई
रमनदीप वर्मा ने बताया कि कुछ कारणों से नौकरी चली गई तो गम को भुलाने के लिए चिट्टे का सहारा लिया। पिता को अचानक अटैक आ गया तो चिट्टे का सेवन किया। हर गम और खुुशी में वह चिट्टे का सहारा लेने लगा था। उसके और पत्नी के पास 4 क्रेडिट कार्ड थे, जिसकी लिमिट साढ़े 3 लाख तक थी। कनाडा सेटल होने के लिए बैंक में 12 लाख पड़े थे। ये सभी खर्च हो गए।

जब सभी जगह से पैसे समाप्त हो गए तो चिट्टे की लत को पूरा करने के लिए पर्सनल लोन ले लिया। कार पर लोन करवा लिया। ऐसे में 30 लाख तक चिट्टे में बर्बाद कर दिए। इतना चिट्टा लेने के कारण उनकी सेहत खराब रहने लगी। जिससे परिवार को चिट्टे की लत का पता चल गया। परिवार ने चिट्टे की लत को छुड़वाने का काफी प्रयास किया परंतु उन पर कोई असर नहीं था। घर में झगड़ा रहने लगा तो पत्नी भी साथ छोड़ कर मायके घर चली गई।

जिंदगी से पूरी तरह से हारकर आत्महत्या के लिए निकला था
रमनदीप ने बताया कि उनकी 4 वर्ष की बेटी उसके पास है। वह जिंदगी से पूरी तरह से हार चुका था, क्योंकि सेहत भी साथ नहीं दे रही थी और घर भी बर्बाद हो चुका था। ऐसे में वह एक दिन आत्महत्या के लिए घर से निकल गया था परंतु 4 वर्ष की बेटी के प्यार ने मौत को गले नहीं लगाने दिया। वापस घर आया और बेटी को गोद में लेकर खूब रोया। जिसके बाद चिट्टे को छोड़ने का मन बनाया।

केंद्र में चिट्टे से ध्यान हटाने को ड्रांइग और डायरी का लिया सहारा : रमनदीप
पिता ने नशा मुुक्ति केन्द्र संगरूर संबंधी सुन रखा था तो उन्हें संगरूर में भर्ती करवाया गया। वह संतुष्ट नहीं थे क्योंकि उसे लग रहा था कि लुधियाना छोड़ कर संगरूर में क्या होगा। परंतु जैसे- जैसे दिन व्यतीत होने लगे तो अच्छा लगने लगा। चिट्टे से ध्यान हटाने के लिए वहां डायरी लिखना शुरू की। ड्राइग का शौक था तो काफी समय ड्राईंग में बिताने लगा। केन्द्र में योग, पाठ, मोमबत्ती बना कर भी मन को हटाने का प्रयास किया गया। जिसमें वह कामयाब रहा है। उसने बताया कि वह अपनी पत्नी को भी बेहद प्यार करता है और दोबारा अपना परिवार बसाने का प्रयास करेगा।

नशा छोड़ने को आत्मविश्वास, मनोबल और आज्ञाकारी होना जरूरी, रमनदीप में तीनों थे : मोहन शर्मा
नशामुक्ति केन्द्र के डायरैक्टर मोहन शर्मा का कहना है कि उन्होंने रमनदीप की कॉसलिंग की तो मालूम पड़ा कि वह नशा छोडऩा चाहता है। उसमें आत्म विश्वास, मनोबल और वह बेहद आज्ञाकारी भी था। तीनों चीजों ने उसे नशा छोड़नेे में मदद की है। रमन ने अनुशासन की पूरी पालना की है। उसे नशा छोड़ने में करीब पौने 2 माह का समय लगा था।



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Health deteriorated again, a happy family also dispersed, fed up and embraced death, and decided to live for the daughter


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