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Sunday, December 6, 2020

दो बार शहर के घर गिनने में 2.60 करोड़ बर्बाद किए, अब फिर 2.39 करोड़ खर्चेंगे,निगम में पब्लिक के पैसे की बर्बादी का बड़ा उदाहरण

पंजाब सरकार ने साल 2013 में प्राॅपर्टी टैक्स लागू किया था। तब से टैक्स कलेक्शन बढ़ाने के लिए निगम द्वारा कराए दो सर्वे फाइलों में बंद हैं। टैक्स की कलेक्शन से लेकर डिफाॅल्टरों की पहचान तक कोई फायदा तो हुआ नहीं, लेकिन सर्वे करने वाली एजेंसी को 2.60 करोड़ रुपए की पेमेंट जरूर हो गई।

अब तीसरी बार स्मार्ट सिटी के खाते से 2.39 करोड़ की लागत से एक बार फिर ड्रोन सर्वे को लेकर टेंडर प्रोसेस चल रहा है। कहा जा रहा है कि नए सर्वे में सिटी की मौजूदा करीब 3 लाख प्राॅपर्टी पर यूआईडी नंबर के साथ क्यूआर (क्विक रिस्पांस कोड) वाली स्टील प्लेट लगाई जाएंगी। इसके बाद प्राॅपर्टी टैक्स की कलेक्शन में बढ़ोतरी से लेकर वन क्लिक में डिफाल्टर की पहचान और रिकवरी का काम आसान होगा।

इतना ही नहीं योजना के मुताबिक ऑनलाइन प्राॅपर्टी डिटेल में पानी-सीवरेज के बिल, प्राॅपर्टी का नक्शा और उसका स्टेटस सहित लाइसेंस से लेकर अन्य डिटेल अटैच होगी। स्मार्ट सिटी में होने वाले ड्रोन सर्वे का आधार जीआईएस सर्वे का ही डाटा होगा। अब हर प्राॅपर्टी की फोटो के साथ डाटा तैयार होगा।

पहला सर्वे : 2014 में खर्च 60 लाख

पूर्व मेयर राकेश राठौर के कार्यकाल में तब हाउस टैक्स की कलेक्शन का दायरा बढ़ाने और सिटी की प्राॅपर्टी की डिटेल के लिए पहला सर्वे कराया गया था। तब नोएडा की मैप माय इंडिया कंपनी ने डोर-टू-डोर सर्वे कर निगम को डाटा बैंक दिया था। प्राॅपर्टी टैक्स लागू होने के बाद इसका कोई फायदा नहीं हुआ, कारण सिर्फ डाटा बैंक से प्राॅपर्टी की पहचान संभव नहीं हो सका। 2014 में पहले सर्वे में 60 लाख रुपए खर्च हुए।

2016 में जीआईएस सर्वे, 2 करोड़ खर्च, लेकिन यूआईडी नंबर न होने से हुआ बेकार
पूर्व मेयर सुनील ज्योति के कार्यकाल में जीआईएस सर्वे कराया गया। 2 करोड़ के टेंडर पर दाराशाह नाम की कंसल्टेंट कंपनी ने सर्वे कर निगम को 2.92 लाख प्राॅपर्टी का डाटा दिया था। बाद में हर प्राॅपर्टी का यूआईडी नंबर जारी करना था ताकि अलग-अलग डिटेल ऑनलाइन की जाए। बीते 4 साल से यूआईडी नंबर जारी न होने से जीआईएस सर्वे का डाटा भी निगम के लिए बेकार साबित हुआ।

चार साल में हजारों प्राॅपर्टी बढ़ीं

जीआईएस सर्वे में 2.92 लाख प्राॅपर्टी का डाटा तैयार हुआ था, लेकिन तब से हजारों प्राॅपर्टी बढ़ी हैं। खासकर अवैध काॅलाेनी में घर, दुकानें, कांप्लेक्स में शोरूम जैसी कई प्राॅपर्टी बढ़ी है। इतना ही नहीं हजारों प्राॅपर्टी का आकार बदला है और काॅमर्शियल भी हुआ है, जिसे नए सर्वे में अपडेट किया जाएगा। वैसे निगम अभी 3 लाख कुल प्राॅपर्टी का टारगेट लेकर चल रहा है।

निगम अब तक जीआईएस सर्वे के डाटा को ही प्राॅपर्टी टैक्स का आधार बनाकर चल रहा है। 2.92 लाख में से 62,000 प्राॅपर्टी टैक्स के दायरे से बाहर है। जबकि रिहायशी 5 मरले में एक मंजिल तक, 2 मरले की प्राॅपर्टी में पूरी छूट है और खाली प्लाॅट से भी टैक्स नहीं लेना है। प्राॅपर्टी टैक्स के सुपरिंटेंडेंट महीप सरीन का कहना है कि करीब 1.60 लाख प्राॅपर्टी टैक्स के दायरे में है, इसमें साल 2019-20 में 1.05 लाख प्राॅपर्टी से करीब 29 करोड़ का टैक्स कलेक्शन हुआ है।

नया सर्वे समय की जरूरत है, बढ़ेगी टैक्स और बिल कलेक्शन
मेयर जगदीश राजा का कहना है कि नए सर्वे से 4 साल में नई बनी प्राॅपर्टी का डाटा अपडेट हो जाएगा। साथ ही प्रत्येक प्राॅपर्टी का यूआईडी नंबर और उसकी प्लेटें लगने के बाद टैक्स और पानी, सीवरेज के बिल की कलेक्शन बढ़ेगी। डिफाल्टर की पहचान, रिकवरी आसान होगी।
निगम को पता रहेगा कि कौन सी प्राॅपर्टी कितनी मंजिल की है, लंबाई-चौड़ाई का पूरा डाटा रहेगा। सर्वे के साथ ही यूआईडी नंबर के क्यू आर कोड वाली स्टील की प्लेटें लगाई जाएगी। स्मार्ट सिटी में होने वाले ड्रोन सर्वे का आधार जीआईएस सर्वे का डाटा होगा।



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2.60 crores wasted in counting city houses twice, now 2.39 crores will be spent again


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